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धार्मिक आस्थाएँ 15 जुलाई 2026 2 मिनट का पठन 15 घंटे पहले

गोंचा तिहार का इतिहास: राजा पुरुषोत्तम देव कैसे जगन्नाथ पुरी से बस्तर लाए रथ

अपडेट किया गया: 2 घंटे पहले

गोंचा तिहार का इतिहास: राजा पुरुषोत्तम देव कैसे जगन्नाथ पुरी से बस्तर लाए रथ

बस्तर का गोंचा तिहार केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि सदियों पुरानी आस्था, भक्ति और सांस्कृतिक विरासत की जीवंत पहचान है।

जब भी बस्तर के ऐतिहासिक पर्वों की चर्चा होती है, तो गोंचा तिहार का नाम सबसे पहले लिया जाता है। हर वर्ष आषाढ़ मास में मनाया जाने वाला यह पर्व भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा से जुड़ा है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस परंपरा की शुरुआत कैसे हुई और इसका संबंध बस्तर के काकतीय शासक राजा पुरुषोत्तम देव से क्यों जोड़ा जाता है।

राजा पुरुषोत्तम देव की अद्भुत भक्ति

ऐतिहासिक अभिलेखों और शिलालेखीय प्रमाणों के अनुसार, काकतीय वंश की चौथी पीढ़ी के शासक राजा पुरुषोत्तम देव की राजधानी बड़े डोंगर थी। वे भगवान जगन्नाथ के अनन्य भक्त थे। कहा जाता है कि अपनी गहरी श्रद्धा के कारण उन्होंने पेट के बल चलते हुए जगन्नाथ पुरी की कठिन तीर्थयात्रा की। यात्रा पूरी होने पर उन्होंने भगवान जगन्नाथ को द्रव्य, रत्न और बहुमूल्य भेंट अर्पित की।

भगवान जगन्नाथ ने दिया आशीर्वाद

राजा पुरुषोत्तम देव की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान जगन्नाथ ने पुरी के तत्कालीन राजा को स्वप्न में दर्शन दिए और कहा—

"बस्तर से मेरा परम भक्त आया है। उसका सम्मान करो और उसे मेरा रथ भेंट करो।"

भगवान की आज्ञा का पालन करते हुए पुरी के राजा ने राजा पुरुषोत्तम देव का सम्मान किया और उन्हें पवित्र रथ भेंट किया।

बस्तर में शुरू हुई रथयात्रा की परंपरा

कुछ समय पुरी में प्रवास करने के बाद राजा पुरुषोत्तम देव उस रथ को लेकर अपनी राजधानी बड़े डोंगर लौटे। वहां उन्होंने पहली बार भगवान जगन्नाथ के रथ का सार्वजनिक परिचालन कराया।

यहीं से बस्तर में रथयात्रा पर्व की शुरुआत हुई, जो आगे चलकर पूरे क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान बन गया।

बड़े डोंगर से जगदलपुर तक पहुंची परंपरा

समय के साथ बस्तर की राजधानी बड़े डोंगर से ग्राम बस्तर और बाद में जगदलपुर स्थानांतरित हुई। राजधानी के साथ यह धार्मिक परंपरा भी आगे बढ़ती रही।

आज यही रथयात्रा गोंचा तिहार के नाम से प्रसिद्ध है, जिसे बस्तर के सबसे महत्वपूर्ण लोकपर्वों में गिना जाता है।

गोंचा तिहार की विशेषता

गोंचा तिहार केवल धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह बस्तर की लोक संस्कृति, जनजातीय परंपराओं और भगवान जगन्नाथ के प्रति अटूट श्रद्धा का संगम है।

इस पर्व के दौरान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की भव्य रथयात्रा निकाली जाती है। इसके साथ ही पारंपरिक मेलों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और प्रसिद्ध तुपकी परंपरा का भी आयोजन होता है, जो इस उत्सव को विशिष्ट बनाती है।

आज भी जीवित है सदियों पुरानी विरासत

सदियों पहले राजा पुरुषोत्तम देव द्वारा शुरू की गई यह परंपरा आज भी उसी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जा रही है। गोंचा तिहार बस्तर के लोगों के लिए केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि अपनी ऐतिहासिक विरासत, आस्था और सांस्कृतिक पहचान को संजोए रखने का माध्यम है।

हर वर्ष हजारों श्रद्धालु और पर्यटक इस ऐतिहासिक पर्व के साक्षी बनते हैं और बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा को करीब से अनुभव करते हैं।

लेखक

बस्तर संवाददाता

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